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इन्हेलेशन थेरेपी – मूल बातें   

डॉ. एस के लुहाडिया 
प्रोफेसर
टीबी एवं छाती रोग विभाग
गीतांजलि मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल
उदयपुर (राजस्थान)

(इनहेलेशन थेरेपी वर्तमान में अस्थमा, सी.ओ.पी.डी. व कुछ अन्य श्वास रोगों के इलाज के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुई है। परन्तु अभी भी रोगियों को इसे अपनाने में कुछ हिचक है। लेखक ने बड़े ही सरल तरीके से इनहेलेशन थेरेपी के तरीकों का वर्णन कर रोगियों एवं उसके परिजनों द्वारा उठाई जाने वाली शंकाओं का समाधान करने का सराहनीय प्रयत्न किया है।

संपादक

इन्हेलेशन थेरेपी क्या है

साधारण श्वसन क्रिया से दवाई को सीधे श्वसन तंत्र में पहुंचाना इन्हेलेषन थेरेपी कहलाता है। ब्रोन्कियल अस्थमा और सीओपीडी के लिए यह आजकल एक आदर्ष थेरेपी बन गई है।

एरोसोल थेरेपी क्यों

सिस्टेमेटिक दुष्प्रभाव से बचने के लिए जल्दी राहत और कम खुराक में चिकित्सा सम्बन्धी प्रभाव पाने के लिए दवा सीधे श्वास नली या फफड़ों में दी जानी चाहिए जैसे की आँख, कान व त्वचा की बीमारियों में दी जाती है। अस्थमा की दवाई श्वसन के माध्यम (इन्हेलेषन थेरपी) से गर्भावस्था में व रक्तचाप, मधुमेह और हृदय रोग के मरीजों को दी जानी सुरक्षित है।

एरोसोल थेरेपी के यंत्र

आसानी से उपलब्ध व काम में आने वाले यंत्र हैः-
1.नेबुलाईज़र
2.मीटर्ड डोस इन्हेलर (एमडीआई)
3.ड्राई पाउडर इन्हेलर (डीपीआई)
नेबुलाईज़रः-
यह बिजली से चलने वाली ऐसी मषीन है जो दवाई के सोल्यूषन को एरोसोल (दवा के सूक्ष्म बूंदों का गुब्बारा) में बदलती है।
इसका मूल्य लगभग दो हजार रूपए है और एक खुराक लेने में लगभग 5-10 मिनट लगते है।
मीटर्ड डोस इन्हेलर (एमडीआई)-
यह बहुत ही सुविधाजनक व छोटा यंत्र है जिसके कनस्टर में दवाई और प्रोपेलेन्ट रखते है। जब कनिस्टर को दबाया जाता है तो यह यंत्र एक निष्चित मात्रा में दवाई की खुराक स्प्रे के रूप में पहुंचाता है। यह यंत्र सबसे वाजिब दाम व सबसे ज्यादा काम में लिया जाने वाला है। इस यंत्र को और अधिक प्रभावषाली बनाने के लिए इसके साथ स्पेसर व बच्चों में बेबी मास्क का प्रयोग करना चाहिए।
ड्राई पाउडर इन्हेलर (डीपीआई)ः- यह एक ऐसा यंत्र है जिसमें दवाई पाउडर के रूप में इस्तेमाल की जाती है। इस यंत्र से एक या एक से अधिक खुराक दी जा सकती है। यह उपयोग लेने में सबसे आसान है और पर्यावरण प्रदुषण भी नहीं करती ळें
यंत्रों का चुनावः- 1. तीव्र घात (अटैक) और गम्भीर अस्थमा
– स्पेसर के साथ एमडीआई
– नेबुलाईज़र
2. नवजात और षिषु
– नेबुलाईज़र
3. 4 वर्ष से कम उम्र के बच्चे
– बी मास्क और स्पेसर के साथ एमडीआई
4. 4-6 वर्ष की उम्र के बच्चे
– स्पेसर के साथ एमडीआई
5. 6 वर्ष की उम्र से अधिक के बच्चे व युवा
– डीपीआई
– एमडीआई
तकनीकः- एरोसोल थेरेपी के प्रभाव की क्षमता यंत्र को इस्तेमाल करने की सही तकनीक पर निर्भर करता है।

डीपीआई

1. वा की खुराक को यंत्र में भरें (रोटाकेप को तोड़कर)
2. पूरी तरह बारह की तरफ श्वास छोडें
3. गर्दन को पीछे की तरफ झुका कर रखें
4. यंत्र के माउथ पीस को होठों के बीच में जोर से दबाएं
5. अन्दर की तरफ जोर से गहरी व तेज श्वास लें
6. यंत्र को हटाकर मुँह को बंद कर लें
7. 4-10 सेकण्ड के लिए श्वास रोक लें
8. 2-7 तक क्रम फिर से दोहरा सकते हैं
9. स्टीरोईड लेने के बाद मुँह व गले को कुल्ला या गरारे कर के साफ करें।

सावधानियां

1. गर्दन पीछे की तरफ झुकी होनी चाहिए।
2. एमडीआई में श्वास गहरी व धीरे-धीरे लेनी चाहिए जबकि डीपीआई में श्वास गहरी व जल्दी-जल्दी लेनी चाहिए।
3. स्टीरोईड लेने के बाद मुँह व गले को हमेषा कुल्ला या गरारे कर के साफ करना चाहिए।

आम जटिलता

• मुँह या जीभ पर छाले होना
• खराष या आवाज में भारीपन
• खांसी आना
• गले में ठण्डक या जलन होना
यह पेरषानियां अच्छी तकनीक से या स्पेसर के साथ एमडीआई इस्तेमाल करके दूर की जा सकती है।

एयरोसोल चिकित्सा का भविष्य

एरोसोल थेरेपी ब्रोन्किअल अस्थमा व सीओपीडी में उपयोगी साबित हो चुकी है। यह थेरेपी मधुमेह रोग में इन्सुलिन देने और संक्रमित रोगों में एन्टीबाॅयटिक व इम्यूनोमोड्यूलेटर्स देने के लिए काम आएगी।

एयरोसोल चिकित्सा के बारे में मिथक

यह एक बहुत ही प्रचलित भ्रान्ति है, कि इन्हेलेषन थेरेपी एक आदत बन जाती है और इसका उपयोग केवल अस्थमा की गम्भीर अवस्था में ही किया जाना चाहिए। जबकि इसका हम लगातार प्रयोग कर सकते हैं और अस्थमा ठीक होने पर इसे बन्द कर सकते हैं तथा बीमारी के शुरूआती दौर में यह ज्यादा असरदार व सुरक्षित होता है। गोलियां व इन्जेक्षन का प्रयोग सीआपीडी और अस्थमा की गम्भीर अवस्था में ही करना चाहिए।

डॉ. एस.के. लू हा डि आ
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